Satsang with Dev OM

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प्रश्न : देव ओम जी संसार में फसे मनुष्य के किये लिए अपनी मनोवृत्तियों पर नियंत्रण कठिन है । जैसे मै पूजा पर २ मिनट से ज्यादा एकाग्र ही नहीं हो पाती और ध्यान उन वस्तुओ या अपने बच्चो के मोह में चला जाता है और उनके क्रिया के तौर पर प्रतिक्रिया होती है कई बार प्रतिक्रिया अनावश्यक होती है पर माया तू इतनी ठगनी की रोक ही नहीं पाते इसका क्या हम जैसे साधारण लोगो के लिए ध्यान मेडिटेशन कठिन है

जहा तक मुझे लगता है आपका दर्शन सुख की ओर प्रेरित है, सुख, ही वह प्रकाश है जिससे हममे प्रकाश रुपी ऊर्जा प्रवाहित होती है.

देव ओम जी : बात एकाग्रता की नहीं अपितु समग्रता की है। व्यक्ति केवल समग्र होने का प्रयत्न करे अपने जीवन के प्रत्येक कार्य , प्रत्येक विचार एवं प्रत्येक भाव में । बुद्धि मनसा च कर्मणा । समग्रता से आवश्यकतानुसार एकाग्रता सहज ही आ जाती है । यह ही सूत्र है ।

मैं सुख की नहीं अपितु आनंद की बात करता हूँ । मेरा दर्शन अधिकतम रूप से शिव के दर्शन के अनुरूप है । शिव कहते हैं “जीवन का आनंद भोगना ही समाधि है” । परन्तु किस प्रकार इस अवस्था को उपलब्ध हुआ जाए के व्यक्ति सहज ही व अहिंसक एवं क्रियात्मक रूप से इस जीवन में, इस सृष्टि में होने के आनंद को भोग सके, यही साधना है । इस जीवन का प्रत्येक पल सत्यम शिवम सुंदरम से अविभूत होना चाहिए तभी सहज समाधि है । मेने अपनी पुस्तक शिवसूत्र में इसका वर्णन किया है ।

आपके प्रश्न से मुझे भी अभिव्यक्ति का मार्ग मिलता है । मेरा यह भी आनंद है । आपका स्वागत है । 

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